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Monday, 17 September 2018

जानें तुलसी चढ़ाने से क्यों नाराज हो जाते हैं भगवान गणेश

पुराणों में वर्णित है कि भगवान विष्‍णु, राम और कृष्‍ण को तुलसी जी का भोग लगाने से भगवान प्रसन्‍न होते है .. और प्रसाद को ग्रहण करते हैं। परंतु गणेशजी के भोग में तुलसी का प्रयोग वर्जित बताया गया है। गणेशजी को तुलसी का भोग लगाने से भगवान नाराज हो जाते हैं।

Thursday, 8 February 2018

हमेशा भगवान शिवजी की तरफ ही मुंह करके क्यों बैठते हैं नंदी

जिस तरह नंदी की नजऱ भगवान शंकर की तरफ होती हैं उसी तरह हमारी भी नजर आत्मा की ओर होनी चाहिए

भोलेनाथ के दर्शन को जब भी हम जाते हैं तो हमारा सारा ध्यान शिवलिंग पर ही होता है और उसके बाद मंदिर की कलाकृति और बाद में बाकी अन्य चीज़ों के प्रति हमारी नज़र जाती है। मंदिर में हम सयभी ने नंदी गाय को तो देखा ही है और शिवलिंग तक पहु़चने से पहले हम नंदी के समक्ष भी अपने शीष झुकाते हैं और उन्हें नमन करते हैं? 

Saturday, 30 December 2017

Maa Tara Chandi Temple Sasaram & Mundeshwari Temple माँ ताराचण्डी मंदिर

Maa Tara Chandi Temple Sasaram बिहार राज्य के रोहतास जिले सासाराम में कैमूर पहाड़ी के गुफा में स्थित माँ ताराचण्डी देवी का मंदिर (Maa Tara Chandi Temple Sasaram) चंदन शहीद पहाड़ियों से लगभग 1 किमी दूर स्थित हैं। यहाँ चंडी देवी मंदिर के पास, एक चट्टान पर प्रताप धवल का एक शिलालेख भी है। हिंदू पूजा करने के लिए यहाँ बड़ी संख्या में आते हैं इसलिए यह एक सुंदर धार्मिक स्थल बन गया है।

Tuesday, 28 November 2017

शिव के श्राप से यहां पत्थर बन गए थे देवी देवता :- Unakoti

त्रिपुरा की राजधानी अगरतल्ला से 178 किलोमीटर दूर है उनाकोटी, जिसका शाब्दिक अर्थ है करोड़ में एक कम।


यहां मौजूद है निन्यावे लाख निन्यानवे हज़ार नौ सौ निन्यानवे मूर्तियां। ये मूर्तियां किसने बनाई और कैसे ? ये आज भी रहस्य बना हुआ है, आखिर इस जंगल मे ऐसी खूबसूरत मूर्तियां बनाई किसने और क्यों ?

Saturday, 2 September 2017

महामृत्युंजय-मंत्र की रचना कैसे हुई?

शिवजी के अनन्य भक्त मृकण्ड ऋषि संतानहीन होने के कारण दुखी थे. विधाता ने उन्हें संतान योग नहीं दिया था.मृकण्ड ने सोचा कि महादेव संसार के सारे विधान बदल सकते हैं. इसलिए क्यों न भोलेनाथ को प्रसन्नकर यह विधान बदलवाया जाए.

मृकण्ड ने घोर तप किया. भोलेनाथ मृकण्ड के तप का कारण जानते थे इसलिए उन्होंने शीघ्र दर्शन न दिया लेकिन भक्त की भक्ति के आगे भोले झुक ही जाते हैं.

Tuesday, 18 July 2017

ऐसी मान्यता है 5 मंगलवार यहाँ दर्शन करने से कठिन से कठिन विपदा दूर हो जाती है

उलटे हनुमान मंदिर परिसर में पीपल, नीम, पारिजात, तुलसी, बरगद के पेड़ हैं। यहाँ वर्षों पुराने दो पारिजात के वृक्ष हैं। पुराणों के अनुसार पारिजात वृक्ष में हनुमानजी का भी वास रहता है

भारत की धार्मिक नगरी उज्जैन से केवल 30 किमी दूर स्थित सांवेर में उल्टे हनुमानजी का मंदिर हैं ऐसा कहा जाता है कि पूरे भारत में ये ही सिर्फ उल्टे हनुमान का मंदिर हैं। यह मंदिर साँवेर नामक स्थान पर स्थापित है इस मंदिर को कई लोग रामायण काल के समय का बताते हैं। मंदिर में भगवान हनुमान की उलटे मुख वाली सिंदूर से सजी मूर्ति विराजमान है। सांवेर का हनुमान मंदिर हनुमान भक्तों का महत्वपूर्ण स्थान है यहाँ आकर भक्त भगवान के अटूट भक्ति में लीन होकर सभी चिंताओं से मुक्त हो जाते हैं। यह स्थान ऐसे भक्त का रूप है जो भक्त से भक्ति योग्य हो गया।
            भगवान हनुमान के एक विशेष मंदिर तक जो साँवेर नामक स्थान पर स्थित है। इस मंदिर की खासियत यह है कि इसमें हनुमानजी की उलटी मूर्ति स्थापित है। और इसी वजह से यह मंदिर उलटे हनुमान के नाम से मालवा क्षेत्र में प्रसिद्ध है।
स्थिति ऐतिहासिक धार्मिक नगरी उज्जैन से मात्र 30 किमी की दूरी पर स्थित इस मंदिर को यहाँ के निवासी रामायणकालीन बताते हैं। मंदिर में हनुमानजी की उलटे चेहरे वाली सिंदूर लगी मूर्ति है।
कथा
यहाँ के लोग एक पौराणिक कथा का जिक्र करते हुए कहते हैं कि जब अहिरावण भगवान श्रीराम व लक्ष्मण का अपहरण कर पाताल लोक ले गया था, तब हनुमान ने पाताल लोक जाकर अहिरावण का वध कर श्रीराम और लक्ष्मण के प्राणों की रक्षा की थी। ऐसी मान्यता है कि यही वह स्थान है, जहाँ से हनुमानजी ने पाताल लोक जाने हेतु पृथ्वी में प्रवेश किया था।
साँवेर के उलटे हनुमान मंदिर में श्रीराम] सीता] लक्ष्मणजी] शिव पार्वती की मूर्तियाँ हैं। मंगलवार को हनुमानजी को चौला भी चढ़ाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि तीन मंगलवार, पाँच मंगलवार यहाँ दर्शन करने से जीवन में आई कठिन से कठिन विपदा दूर हो जाती है। कहते हैं भक्ति में तर्क के बजाय आस्था का महत्व अधिक होता है। यहाँ प्रतिष्ठित मूर्ति अत्यंत चमत्कारी मानी जाती है। यहाँ कई संतों की समाधियाँ हैं। सन् 1200 तक का इतिहास यहाँ मिलता है।
निकटवर्ती
उलटे हनुमान मंदिर परिसर में पीपल, नीम, पारिजात, तुलसी, बरगद के पेड़ हैं। यहाँ वर्षों पुराने दो पारिजात के वृक्ष हैं। पुराणों के अनुसार पारिजात वृक्ष में हनुमानजी का भी वास रहता है। मंदिर के आसपास के वृक्षों पर तोतों के कई झुंड हैं। इस बारे में एक दंतकथा भी प्रचलित है। तोता ब्राह्मण का अवतार माना जाता है। हनुमानजी ने भी तुलसीदासजी के लिए तोते का रूप धारण कर उन्हें भी श्रीराम के दर्शन कराए थे।
साँवेर के उलटे हनुमान मंदिर में श्रीराम ,सीता, लक्ष्मणजी, शिव,पार्वती की मूर्तियाँ हैं। मंगलवार को हनुमानजी को चौला भी चढ़ाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि तीन मंगलवार, पाँच मंगलवार यहाँ दर्शन करने से जीवन में आई कठिन से कठिन विपदा दूर हो जाती है। यही आस्था श्रद्धालुओं को यहाँ तक खींच कर ले आती है।
Address 
सड़क मार्ग; उज्जैन & 30 किमी इंदौर ; 30 किमी से यहाँ आने; जाने के लिए बस तथा टैक्सी उपलब्ध है। हवाई मार्ग निकटतम एयरपोर्ट इंदौर 30 किमी दूरी पर स्थित ।

मान्‍यता है यहां भगवान शिव को झाड़ू भेंट करने से खत्म होता हैं त्वचा रोग

भारत में ऐसा ही एक शिव मंदिर है जहाँ लोग फूल और दूध के साथ-साथ, झाड़ू भी ईश्वर को समर्पित करते हैं।

पातालेश्वर मंदिर, एक छोटे से गाँव सदत्बदी जो मुरादाबाद और आगरा राजमार्ग पर स्थित है। इस मंदिर में भगवान शिव की पूजा होती है और भगवान शिव यहाँ भक्तों की भेट झाड़ू को भी स्वीकार करते हैं। यहां के लोगो का मानना है कि अगर भगवान शिव को झाड़ू चढ़ाई जाये तो व्यक्ति के सभी प्रकार के त्वचा के रोग ठीक हो जाते है। सदियों पुराने इस मंदिर में वह लोग अधिक आते है जो त्वचा के रोगों से ग्रस्त है। सोमवार भगवान शिव की पूजा के लिए शुभ दिन माना जाता है इस लिए सोमवार को यहाँ भारी भीड़ दर्शन करने आती है।
इस प्राचीन शिव पातालेश्वर मंदिर में श्रद्धालु अपने त्वचा संबंधी रोगों से छुटकारा पाने और मनोकामना पूर्ण करने के लिए झाड़ू चढाते हैं। आसपास के लोग बताते हैं कि यह मंदिर करीब 150 वर्ष पुराना है। इसमें झाड़ू चढ़ाने की रस्म प्राचीन काल से ही है। इस शिव मंदिर में कोई मूर्ति नहीं बल्कि एक शिवलिंग है, जिस पर श्रद्धालु झाड़ू अर्पित करते हैं। सोमवार को यहां हजारों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। धारणा है कि इस मंदिर की चमत्कारी शक्तियों से त्वचा के रोगों से मुक्ति मिल जाती है।

इस चमत्कार के पीछे एक कहानी बताई जाती है कि गांव में कभी एक भिखारीदास नाम का एक व्यापारी रहता था, जो गांव का सबसे धनी व्यक्ति था और वह त्वचा रोग से ग्रसित था। उसके शरीर पर काले धब्बे पड़ गये थे, जिनसे उसे पीड़ा होती थी।

एक दिन वह निकट के गांव के एक वैद्य से उपचार कराने जा रहा था कि रास्ते में उसे जोर की प्यास लगी। तभी उसे एक आश्रम दिखाई पड़ा। जैसे ही भिखारीदास पानी पीने के लिए आश्रम के अंदर गया वैसे ही आश्रम की सफाई कर रहे महंत के झाड़ू से उसके शरीर का स्पर्श हो गया। झाड़ू के स्पर्श होने के क्षण भर के अंदर ही भिखारीदास का दर्द ठीक हो गया। जब भिखारीदास ने महंत से चमत्कार के बारे में पूछा तो उसने कहा कि वह भगवान शिव का प्रबल भक्त है। यह चमत्कार उन्हीं की वजह से हुआ है। भिखारीदास ने महंत से कहा कि उसे ठीक करने के बदले में सोने की अशर्फियों से भरी थैली स्वीकार करे। किन्तु महंत ने अशर्फी लेने से इंकार करते हुए कहा कि वास्तव में अगर वह कुछ लौटाना चाहते हैं तो आश्रम के स्थान पर शिव मंदिर का निर्माण करवा दें। कुछ समय बाद भिखारीदास ने वहां पर शिव मंदिर का निर्माण करवा दिया। धीरे-धीरे मान्यता हो गई कि इस मंदिर में दर्शन कर झाड़ू चढ़ाने से त्वचा के रोगों से मुक्ति मिल जाती है।
आज यहाँ इस तरह के हज़ारों लोग आते हैं जो त्वचा रोग से पीड़ित हैं और आसपास के लोग यह भी बताते हैं कि अधिकतर लोगों को यहाँ आने और झाड़ू चढ़ाने के बाद, इस रोग से मुक्ति भी मिलती है। लेकिन भगवान शिव की महिमा तो वैसे भी अपरम्पार है तो यहाँ लोग त्वचा रोग के अलावा, अपने और सभी दुःख भी लेकर आते हैं।

इस चमत्कारिक शिवलिंग में लाखों लोग सालभर में आते हैं और अपने दुखों से मुक्ति प्राप्त करते हैं।

Saturday, 1 July 2017

द्वापर युग के 7 स्‍थान जहां भगवान श्रीकृष्‍ण ने बिताए थे खास पल

अब मशहूर धर्मिक स्‍थल हैं। हम आप को आज उन सात स्‍थानों के बारे में बताने जा रहे हैं।

श्रीकृष्ण जन्मभूमि

यह है मथुरा स्‍थ‌ित भगवान श्रीकृष्‍ण की जन्मस्‍थली। यहीं कंस के कारागार में भगवान श्रीकृष्‍ण का जन्म हुआ था। अब यहां कारागार तो नहीं है लेक‌िन अंदर का नजारा इस तरह बनाया गया है क‌ि आपको लगेगा क‌ि हां यहीं पैदा हुए थे श्री कृष्‍ण। यहां एक हॉल में ऊंचा चबूतरा बना हुआ है। यह चबूतरा उसी स्‍थान पर है जहां श्री कृष्‍ण ने धरती पर पहला कदम रखा था। श्रद्धालु इसी चबूतरे से स‌िर ट‌िकाकर भगवान का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

नंदराय मंदिर

यह है नंद गांव स्‍थ‌ित नंदराय का मंद‌िर। कंस के भय से वसुदेव जी यहीं नंदराय और माता यशोदा के पास श्री कृष्‍ण को छोड़ गए थे। यहां नंदराय जी का न‌िवास था और श्री कृष्‍णका बालपन गुजरा था। आज यहां भव्य मंद‌िर है। यहीं पास में एक सरोवर है। ज‌िसे पावन सरोवर कहते हैं। माना जाता है क‌ि इसी सरोवर में माता यशोदा श्री कृष्‍ण को स्नान कराया करती थीं।

भद्रकाली मंदिर

हरियाण के कुरुक्षेत्र में स्‍थ‌ित भद्रकाली मंद‌िर के बारे में माना जाता है क‌ि यह एक शक्त‌िपीठ है। यहां पर भगवान श्रीकृष्‍ण और बलराम का मुंडन हुआ था। यहां आज भी भगवान श्रीकृष्ण के पद्चिन्ह मौजूद हैं। यहां श्रीकृष्ण के उन्हीं पद्च‌िन्हों और गाय के पांच खुरों के प्राकृत‌िक च‌िन्हों की पूजा की जाती है।


द्वारकाधीश मंदिर

यह है गुजरात स्‍थ‌ित द्वारिकाधीश मंद‌िर। मथुरा छोड़कर श्री कृष्‍ण ने यहां अपनी नगरी बसाई थी। सागर तट पर बना यह मंद‌िर द्वारिकाधीश श्रीकृष्‍ण का राजमहल माना जाता है। आज यह स्‍थान व‌िष्‍णु भक्तों के ल‌िए मोक्ष का द्वार माना जाता है। आसमान को छूता मंद‌िर का ध्वज श्री कृष्‍ण की व‌िशालता को दर्शाता है।

ज्योत‌िसर तीर्थ

कुरुक्षेत्र में जहां श्री कृष्‍ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश द‌िया था। आज वह स्‍थान ज्योत‌िसर और गीता उपदेश स्‍थल के नाम से जाना जाता है। यहीं पर पीपल के वृक्ष के नीचे श्री कृष्‍ण ने अमर गीता का ज्ञान द‌िया था। यहां आज भी वह पीपल का वह पेड़ मौजूद है। जिसके नीचे श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था।